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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
बदन का फ़ैसला । मोहम्मद अल्वी
ये बदन
जिसे मैं
बेहतरीन ग़िज़ाएँ (भोजन) खिलाता रहा
पानी की जगह
शराब पिलाता रहा
यही बदन
मुझ से कहता है
जाओ
दफ़ा हो जाओ
जन्नत के मज़े उड़ाओ
कि दोज़ख़ के अज़ाब उठाओ
मेरी बला से
मैं तो अब
क़ब्र में सो रहूँगा
मिट्टी हूँ
मिट्टी का हो रहूँगा!!