Pratidin Ek Kavita

प्रश्न | कुँवार नारायण

तारों की अंध गलियों में 
गूँजता हुआ उद्दंड उपहास...
 
वह मेरा प्रश्न है

विशाल आडंबर,
अभी चुभती दृष्टि की गर्म खोज में मैंने 
प्रश्नाहत जिस विराट हिमपुरुष को
गलते हुए देखा...

क्या वह तेरा उत्तर था?


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

प्रश्न | कुँवार नारायण

तारों की अंध गलियों में
गूँजता हुआ उद्दंड उपहास...

वह मेरा प्रश्न है

विशाल आडंबर,
अभी चुभती दृष्टि की गर्म खोज में मैंने
प्रश्नाहत जिस विराट हिमपुरुष को
गलते हुए देखा...

क्या वह तेरा उत्तर था?