Pratidin Ek Kavita

आना |  कैलाश मनहर

आऊँगा
बारिश से भीगे खेतों पर
क्वार की धूप बनकर
चमकता-सा....

आऊँगा
थके हुए बदन की रगों में
धारोष्ण दूध की तरह
उफनता-सा....

आऊँगा
रूठी हुई प्रेमिका की आँखों में
मानभरी लालिमा लिए
दमकता-सा....

आऊँगा
अकेले बच्चे के पास
नाचती हुई चिड़िया के परों में
लचकता-सा....

आऊँगा
मकई के दानों में बनकर
मिठास,
शरद के आसपास
सूर्योदय के साथ
चूमने को तुम्हारे खुरदरे हाथ
ज़रूर ज़रूर आऊँगा,
करना तुम -- इन्तज़ार....

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

आना | कैलाश मनहर

आऊँगा
बारिश से भीगे खेतों पर
क्वार की धूप बनकर
चमकता-सा....

आऊँगा
थके हुए बदन की रगों में
धारोष्ण दूध की तरह
उफनता-सा....

आऊँगा
रूठी हुई प्रेमिका की आँखों में
मानभरी लालिमा लिए
दमकता-सा....

आऊँगा
अकेले बच्चे के पास
नाचती हुई चिड़िया के परों में
लचकता-सा....

आऊँगा
मकई के दानों में बनकर
मिठास,
शरद के आसपास
सूर्योदय के साथ
चूमने को तुम्हारे खुरदरे हाथ
ज़रूर ज़रूर आऊँगा,
करना तुम -- इन्तज़ार....