Pratidin Ek Kavita

मैं उनका ही होता|  गजानन माधव मुक्तिबोध

मैं उनका ही होता, जिनसे
मैंने रूप-भाव पाए हैं।

वे मेरे ही लिए बँधे हैं
जो मर्यादाएँ लाए हैं।

मेरे शब्द, भाव उनके हैं,
मेरे पैर और पथ मेरा,

मेरा अंत और अथ मेरा,
ऐसे किंतु चाव उनके हैं।

मैं ऊँचा होता चलता हूँ
उनके ओछेपन से गिर-गिर,

उनके छिछलेपन से खुद-खुद,
मैं गहरा होता चलता हूँ।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

मैं उनका ही होता| गजानन माधव मुक्तिबोध

मैं उनका ही होता, जिनसे
मैंने रूप-भाव पाए हैं।

वे मेरे ही लिए बँधे हैं
जो मर्यादाएँ लाए हैं।

मेरे शब्द, भाव उनके हैं,
मेरे पैर और पथ मेरा,

मेरा अंत और अथ मेरा,
ऐसे किंतु चाव उनके हैं।

मैं ऊँचा होता चलता हूँ
उनके ओछेपन से गिर-गिर,

उनके छिछलेपन से खुद-खुद,
मैं गहरा होता चलता हूँ।