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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
बस एक काम यही बार बार करता था । माधव कौशिक
बस एक काम यही बार बार करता था
भँवर के बीच से दरिया को पार करता था
उसी की पीठ पर उभरे निशान ज़ख़्मों के
जो हर लड़ाई में पीछे से वार करता था
अजीब शख़्स था ख़ुद अलविदा कहा लेकिन
हर एक शाम मेरा इंतिज़ार करता था
सुना है वक़्त ने उस को बना दिया पत्थर
जो रोज़ वक़्त को भी संगसार करता था
हवा ने छीन लिया अब तो धूप का जादू
नहीं तो पेड़ भी पत्तों से प्यार करता था