Pratidin Ek Kavita

पीली तितली।  ज्योत्स्ना मिलन

उड़ रही थी
छोटी-सी

पीली तितली
उड़े जा रही थी

जैसे बैठना भूल चुकी हो
या उड़ना ही उड़ना

जानती हो
पौधे से पौधे तक

उड़ती जाती
फूल की उम्मीद में

कि फूलों के बीच
पहचानी न जाए

तितली की तरह
इस क़दर उड़ रही थी

कि अपने उड़ने में
फूल हुई जा रही थी तितली।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

पीली तितली। ज्योत्स्ना मिलन

उड़ रही थी
छोटी-सी

पीली तितली
उड़े जा रही थी

जैसे बैठना भूल चुकी हो
या उड़ना ही उड़ना

जानती हो
पौधे से पौधे तक

उड़ती जाती
फूल की उम्मीद में

कि फूलों के बीच
पहचानी न जाए

तितली की तरह
इस क़दर उड़ रही थी

कि अपने उड़ने में
फूल हुई जा रही थी तितली।